वातावरण (atmosphere)
हमारे चारों ओर मौजूद अजैव और जैव कारकों से बना वह क्षेत्र जिसमे हम रहते हैं एवम जिससे प्रभावित होते है ,उसे पर्यावरण या वातावरण कहते हैं। इसके अन्तर्गत जलमंडल (hydrosphere), वायुमण्डल (atmosphere), जीवमंडल (biosphere), एवम स्थलमण्डल (lithosphere) आते हैं।
* जैव कारक जैसे :- पेड़-पौधे ,जंतु ,मनुष्य,सूक्ष्मजीव,आदि ।
* अजैव कारक जैसे:- मिट्टी, हवा,जल,ताप, प्रकाश आदि।
पारिस्थितिक तंत्र या पारितन्त्र (ecosystem)
जीवमंडल के जैव अजैव घटक एवम इनके बीच ऊर्जा और पदार्थो का आदान-प्रदान ये सभी मिलकर पारिस्थितिक तंत्र या पारितन्त्र कहलाते हैं। यह जीवमंडल कि एक स्वपोषित संरचनात्मक एवम कार्यात्मक इकाई होती है।
पारिस्थितिक तंत्र के दो मुख्य अवयव होते हैं-
1 जैव अवयव (organic organ)
2 अजैव अवयव ( abiotic organ)
* जैव अवयव :- जैव अवयव यानि सजीव ।इसे तीन वर्गों में बांटा गया है-
1 उत्पादक (producers)
2 उपभोक्ता (consumers)
3 अपघटनकर्ता या अपमार्जक ( decomposers)
* उत्पादक (producers):- वैसे जीव जी अपना भोजन स्वयं बनाते हैं ,उन्हें उत्पादक कहते हैं । जैसे :- हरे पौधे,घास,शैवाल आदि। इन्हे स्वपोषी कहा जाता है क्योंकि ये भोजन का संश्लेषण स्वयं करते हैं।
* उपभोक्ता (consumer):- वैसे जीव जो अपने पोषण के लिए पूर्ण रूप से उत्पादक पर निर्भर रहते हैं उन्हें उपभोक्ता कहते हैं ।इन्हे परपोषी भी कहा जाता है। उपभोक्ताओ को तीन क्षेणियो में बांटा गया है-
1 प्राथमिक उपभोक्ता (primary consumer)
2 द्वितीयक उपभक्ता (secondary consumer)
3 तृतीयक उपभोक्ता ( tertiary consumer)
* प्राथमिक उपभक्ता :- वैसे उपभोक्ता जो अपने पोषण के लिए उत्पादक को खाते हैं अर्थात हर पेड़-पौधे को खाते हैं उन्हें प्राथमिक उपभोक्ता कहते हैं।जैसे :- गाय ,भैस,बकरी,हिरण, ग्रासहॉपर कुछ कीट आदि।
* द्वितीयक उपभोक्ता :- वैसे जीव जो प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते है अर्थात मांसाहारी (carnivorous) जंतु द्वितीयक उपभोक्ता कहलाती है। जैसे:- शेर,बाघ,कुछ पक्षी सर्प,मेढक आदि।
* तृतीयक उपभोक्ता : - वैसे जीव जो द्वितीयक उपभोक्ताओं को खाते है उन्हें तृतीय उपभोक्ता कहते हैं ।इस श्रेणी के उपभोक्ता उच्च श्रेणी वाले होते हैं जो दूसरे जन्तुओ द्वारा मारे या खाए नही जाते हैं। जैसे :-बाघ,शेर,चीता, गिद्ध आदि।
नोट:- मांसाहारी जीव भिन्न-भिन्न स्थितियों में द्वितीयक या तृतीयक उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं।
नोट:- मनुष्य एवम तिलचट्टा ये दोनो सर्वभक्षी (omnivorous) कहलाते हैं।
* अपघटनकर्ता या अपमार्जक ( decomposers)
वैसे सूक्ष्म जीव जो पेड़-पौधों या जंतु के मृत शरीर तथा जन्तुओ के अपशिष्ट पदार्थ को अपघटित करते हैं ,उन्हें अपघटनकर्ता या अपमार्जक कहते हैं। जैसे:- जीवाणु ,कवक आदि।
जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्म जीव सूक्ष्मुपभोक्ता भी कहलाते हैं।
* अजैव अवयव (abiotic organ)
अजैव अवयव यानि निर्जीव ।इन्हे तीन वर्गों में बांटा गया है-
1 भौतिक वातावरण ( physical environment)
जैसे:- मृदा,जल,वायु आदि
2 पोषण (nutrients)
3 जलवायु ( climate factor)
जैसे :- ताप, आद्रता, दाब, सूर्य की रौशनी आदि।
* आहार श्रृंखला (food chain ):-
पारिस्थितिक तंत्र में श्रृंखलाबद्ध तरीके से जुड़े जीवो में ऊर्जा का एकपथिय प्रवाह आहार श्रृंखला कहलाता है।
जैसे:- घास -> ग्रासहॉपर -> मेढक -> सर्प-> गिद्ध
शैवाल -> छोटे जंतु-> छोटी मछली ->बड़ी मछली
* आहार जल (food web ):-
पारिस्थितिक तंत्र में एक साथ कई आहार श्रृंखलाएं पाई जाती है जो हमेशा सीधी न हो कर एक-दूसरे से आड़े-तिरछे जुड़कर एक जाल बनाती है ।आहार श्रृंखला के इस जाल को आहार जाल कहते हैं।
(ग्रास हॉपर)----------(गिरगिट)
| |
| |
( घास)-------(खरगोश)------(बाज)
| /
| /
(चूहा)-------(साँप)--------
* पोषी स्तर (trophic):-
आहार श्रृंखला में कई स्तर पाए जाते हैं जिनमे ऊर्जा का स्थानांतरण होता है ,इन्ही स्तरों को पोषी स्तर कहा जाता है।
नोट 1 :- विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र में तीन ,पाँच या इससे भी अधिक पोषी स्तर हो सकते हैं।
नोट 2:- विभिन्न पोषी स्तर के जीवो की संख्या का अवलोकन किया जाए तो एक पिरामिड के सदृश आकृति बनती है जिसे संख्या का पिरामिड कहा जाता है।
*जैव -आवर्धन (biomagnification ):- जैव अनिम्नकरणीय पदार्थो की मात्रा का पोषी स्तर में वृद्धि को जैव-आवर्धन कहते हैं।
* अपशिष्ट पदार्थ :- दैनिक कार्यो से उतपन्न अनावश्यक पदार्थ जिसे हम यहाँ-वहाँ फेंक देते हैं, उसे अपशिष्ट पदार्थ है।इन्हे दो वर्गो में बांटा गया है-
1 जैव निम्नकरणीय अपशिष्ट
(Biodegradable waste )
2 जैव अनिम्नकरणीय
( Non-biodegradable waste)
* जैव निम्नकरणीय अपशिष्ट :- वैसे अपशिष्ट पदार्थ जिसे जैविक अपघटन के द्वारा पुनः उपयोग में आने वाली वस्तुओं में बदल दिया जाता है, उसे जैव निम्नकरणीय अपशिष्ट कहते हैं।
जैसे:- कागज , कपास के कपड़े,घरेलू अपशिष्ट आदि।
* जैव अनिम्नकरणीय अपशिष्ट :- वैसे अपशिष्ट जिनका जैविक अपघटन नही होता है अर्थात जो प्राकृतिक विधियों द्वारा नष्ट नही होते हैं ,उसे जैव अनिम्नकरणीय अपशिष्ट कहते हैं।
जैसे:- कीटनाशक,पिड़कनाशक ddt, शीशा, प्लास्टिक आदि।
* कचरा प्रबंधन :- कचरे को एकत्र कर उसका वैज्ञानिक तरीके से समुचित निपटारा को कचरा प्रबंधन कहते हैं।
ओजोन परत एवम ओजोन अवक्षय
=> ओजोन ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बना होता है । यह हमारे वायुमंडल में 15 km से लेकर लगभग 50 km की ऊँचाई तक फैला हुआ है। पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवो के लिए ओजोन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सूर्य के प्रकाश में पाए जाने वाले हानिकारक पराबैगनी किरणों (ultraviolet rays) को अवशोषित कर लेता है। साथ ही यह हमें पराबैगनी किरणों से होने वाले बीमारियों जैसे:- त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद आदि से बचाता है।
परन्तु कुछ पदार्थो जैसे :- फ्लोरोकार्बन (cf),क्लोरोफ्लोरो कार्बन (cfc), सेंट, कीटनाशी, गंधहारक आदि के उपयोग के कारण ओजोन का अवक्षय हो रहा है जो हम सभी के लिए हानिकारक है।
* झाग या फेन उतपन्न करने वाले पदार्थ एरोसॉल कहलाते हैं।
* AC, रेफ्रिजरेटर,जेट इंजन ,अग्निशामक आदि में cfc का उपयोग किया जाता है।
हमारे चारों ओर मौजूद अजैव और जैव कारकों से बना वह क्षेत्र जिसमे हम रहते हैं एवम जिससे प्रभावित होते है ,उसे पर्यावरण या वातावरण कहते हैं। इसके अन्तर्गत जलमंडल (hydrosphere), वायुमण्डल (atmosphere), जीवमंडल (biosphere), एवम स्थलमण्डल (lithosphere) आते हैं।
* जैव कारक जैसे :- पेड़-पौधे ,जंतु ,मनुष्य,सूक्ष्मजीव,आदि ।
* अजैव कारक जैसे:- मिट्टी, हवा,जल,ताप, प्रकाश आदि।
पारिस्थितिक तंत्र या पारितन्त्र (ecosystem)
जीवमंडल के जैव अजैव घटक एवम इनके बीच ऊर्जा और पदार्थो का आदान-प्रदान ये सभी मिलकर पारिस्थितिक तंत्र या पारितन्त्र कहलाते हैं। यह जीवमंडल कि एक स्वपोषित संरचनात्मक एवम कार्यात्मक इकाई होती है।
पारिस्थितिक तंत्र के दो मुख्य अवयव होते हैं-
1 जैव अवयव (organic organ)
2 अजैव अवयव ( abiotic organ)
* जैव अवयव :- जैव अवयव यानि सजीव ।इसे तीन वर्गों में बांटा गया है-
1 उत्पादक (producers)
2 उपभोक्ता (consumers)
3 अपघटनकर्ता या अपमार्जक ( decomposers)
* उत्पादक (producers):- वैसे जीव जी अपना भोजन स्वयं बनाते हैं ,उन्हें उत्पादक कहते हैं । जैसे :- हरे पौधे,घास,शैवाल आदि। इन्हे स्वपोषी कहा जाता है क्योंकि ये भोजन का संश्लेषण स्वयं करते हैं।
* उपभोक्ता (consumer):- वैसे जीव जो अपने पोषण के लिए पूर्ण रूप से उत्पादक पर निर्भर रहते हैं उन्हें उपभोक्ता कहते हैं ।इन्हे परपोषी भी कहा जाता है। उपभोक्ताओ को तीन क्षेणियो में बांटा गया है-
1 प्राथमिक उपभोक्ता (primary consumer)
2 द्वितीयक उपभक्ता (secondary consumer)
3 तृतीयक उपभोक्ता ( tertiary consumer)
* प्राथमिक उपभक्ता :- वैसे उपभोक्ता जो अपने पोषण के लिए उत्पादक को खाते हैं अर्थात हर पेड़-पौधे को खाते हैं उन्हें प्राथमिक उपभोक्ता कहते हैं।जैसे :- गाय ,भैस,बकरी,हिरण, ग्रासहॉपर कुछ कीट आदि।
* द्वितीयक उपभोक्ता :- वैसे जीव जो प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते है अर्थात मांसाहारी (carnivorous) जंतु द्वितीयक उपभोक्ता कहलाती है। जैसे:- शेर,बाघ,कुछ पक्षी सर्प,मेढक आदि।
* तृतीयक उपभोक्ता : - वैसे जीव जो द्वितीयक उपभोक्ताओं को खाते है उन्हें तृतीय उपभोक्ता कहते हैं ।इस श्रेणी के उपभोक्ता उच्च श्रेणी वाले होते हैं जो दूसरे जन्तुओ द्वारा मारे या खाए नही जाते हैं। जैसे :-बाघ,शेर,चीता, गिद्ध आदि।
नोट:- मांसाहारी जीव भिन्न-भिन्न स्थितियों में द्वितीयक या तृतीयक उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं।
नोट:- मनुष्य एवम तिलचट्टा ये दोनो सर्वभक्षी (omnivorous) कहलाते हैं।
* अपघटनकर्ता या अपमार्जक ( decomposers)
वैसे सूक्ष्म जीव जो पेड़-पौधों या जंतु के मृत शरीर तथा जन्तुओ के अपशिष्ट पदार्थ को अपघटित करते हैं ,उन्हें अपघटनकर्ता या अपमार्जक कहते हैं। जैसे:- जीवाणु ,कवक आदि।
जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्म जीव सूक्ष्मुपभोक्ता भी कहलाते हैं।
* अजैव अवयव (abiotic organ)
अजैव अवयव यानि निर्जीव ।इन्हे तीन वर्गों में बांटा गया है-
1 भौतिक वातावरण ( physical environment)
जैसे:- मृदा,जल,वायु आदि
2 पोषण (nutrients)
3 जलवायु ( climate factor)
जैसे :- ताप, आद्रता, दाब, सूर्य की रौशनी आदि।
* आहार श्रृंखला (food chain ):-
पारिस्थितिक तंत्र में श्रृंखलाबद्ध तरीके से जुड़े जीवो में ऊर्जा का एकपथिय प्रवाह आहार श्रृंखला कहलाता है।
जैसे:- घास -> ग्रासहॉपर -> मेढक -> सर्प-> गिद्ध
शैवाल -> छोटे जंतु-> छोटी मछली ->बड़ी मछली
* आहार जल (food web ):-
पारिस्थितिक तंत्र में एक साथ कई आहार श्रृंखलाएं पाई जाती है जो हमेशा सीधी न हो कर एक-दूसरे से आड़े-तिरछे जुड़कर एक जाल बनाती है ।आहार श्रृंखला के इस जाल को आहार जाल कहते हैं।
(ग्रास हॉपर)----------(गिरगिट)
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( घास)-------(खरगोश)------(बाज)
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(चूहा)-------(साँप)--------
* पोषी स्तर (trophic):-
आहार श्रृंखला में कई स्तर पाए जाते हैं जिनमे ऊर्जा का स्थानांतरण होता है ,इन्ही स्तरों को पोषी स्तर कहा जाता है।
नोट 1 :- विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र में तीन ,पाँच या इससे भी अधिक पोषी स्तर हो सकते हैं।
नोट 2:- विभिन्न पोषी स्तर के जीवो की संख्या का अवलोकन किया जाए तो एक पिरामिड के सदृश आकृति बनती है जिसे संख्या का पिरामिड कहा जाता है।
*जैव -आवर्धन (biomagnification ):- जैव अनिम्नकरणीय पदार्थो की मात्रा का पोषी स्तर में वृद्धि को जैव-आवर्धन कहते हैं।
* अपशिष्ट पदार्थ :- दैनिक कार्यो से उतपन्न अनावश्यक पदार्थ जिसे हम यहाँ-वहाँ फेंक देते हैं, उसे अपशिष्ट पदार्थ है।इन्हे दो वर्गो में बांटा गया है-
1 जैव निम्नकरणीय अपशिष्ट
(Biodegradable waste )
2 जैव अनिम्नकरणीय
( Non-biodegradable waste)
* जैव निम्नकरणीय अपशिष्ट :- वैसे अपशिष्ट पदार्थ जिसे जैविक अपघटन के द्वारा पुनः उपयोग में आने वाली वस्तुओं में बदल दिया जाता है, उसे जैव निम्नकरणीय अपशिष्ट कहते हैं।
जैसे:- कागज , कपास के कपड़े,घरेलू अपशिष्ट आदि।
* जैव अनिम्नकरणीय अपशिष्ट :- वैसे अपशिष्ट जिनका जैविक अपघटन नही होता है अर्थात जो प्राकृतिक विधियों द्वारा नष्ट नही होते हैं ,उसे जैव अनिम्नकरणीय अपशिष्ट कहते हैं।
जैसे:- कीटनाशक,पिड़कनाशक ddt, शीशा, प्लास्टिक आदि।
* कचरा प्रबंधन :- कचरे को एकत्र कर उसका वैज्ञानिक तरीके से समुचित निपटारा को कचरा प्रबंधन कहते हैं।
ओजोन परत एवम ओजोन अवक्षय
=> ओजोन ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बना होता है । यह हमारे वायुमंडल में 15 km से लेकर लगभग 50 km की ऊँचाई तक फैला हुआ है। पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवो के लिए ओजोन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सूर्य के प्रकाश में पाए जाने वाले हानिकारक पराबैगनी किरणों (ultraviolet rays) को अवशोषित कर लेता है। साथ ही यह हमें पराबैगनी किरणों से होने वाले बीमारियों जैसे:- त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद आदि से बचाता है।
परन्तु कुछ पदार्थो जैसे :- फ्लोरोकार्बन (cf),क्लोरोफ्लोरो कार्बन (cfc), सेंट, कीटनाशी, गंधहारक आदि के उपयोग के कारण ओजोन का अवक्षय हो रहा है जो हम सभी के लिए हानिकारक है।
* झाग या फेन उतपन्न करने वाले पदार्थ एरोसॉल कहलाते हैं।
* AC, रेफ्रिजरेटर,जेट इंजन ,अग्निशामक आदि में cfc का उपयोग किया जाता है।
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