उत्सर्जन
=> जीवो में उपापचयी क्रियाओ के फलस्वरूप उतपन्न अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन उत्सर्जन कहलाता है।
उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप शरीर में कुछ ऐसे पदार्थों का निर्माण होता है जो शरीर के लिए हानिकारक एवमं अनावश्यक होते है, इन्हे उत्सर्जी पदार्थ कहते हैं तथा जिस क्रिया द्वारा इन पदार्थों को शरीर से बाहर निकाला जाता है उसे उत्सर्जन कहते है।
कुछ उत्सर्जी पदार्थ जैसे:- अमोनिया ,यूरिया,यूरिक एसीड आदि।
पौधों में उत्सर्जन
=> पौधों में उत्सर्जन के लिए कोई विशेष अंग नही होता है।ये विभिन्न तरीकों द्वारा उत्सर्जन करते हैं।
जैसे :- रंध्रों या वात रंध्रों द्वारा ऑक्सीजन का उत्सर्जन जल आदि।
इनके कुछ उत्सर्जी पदार्थ जैसे :- टैनिन,रेजिन,गोंद ,लैटेक्स आदि है।
=> टैनिन वृक्ष की छालों में जबकि रेजिन एवम गोंद पुराने जाइलम में संचित रहता है।
=> कुछ पौधों में गाढ़ा दूधिया तरल उत्सर्जी पदार्थ संचित होते है जिसे लैटेक्स कहते है।
=> गोंद बबूल के पौधों का उत्सर्जी पदार्थ है जबकि रेजिन चीड़ के पौधे का।
=> निम्न वर्ग के जीवों में विशेष प्रकार का उत्सर्जन अंग नहीं होता है। इनमें उत्सर्जन शरीर के सतह द्वारा विसरण प्रक्रिया से होता है।
जबकि जटिल बहुकोशिकीय जीवों में विशेष प्रकार का अंग होता है जिसे "उत्सर्जी अंग" कहते है।
" मनुष्य में उत्सर्जन "
=> वृक्क मनुष्य एवं सभी वर्टिब्रेटा उपसंघ के जीवों का सबसे महत्वपूर्ण उत्सर्जी अंग है। इसके साथ-साथ मूत्रवाहिनी (ureter),मूत्राशय (urinary bladder) तथा मूत्रमार्ग (urethra) भी उत्सर्जन में भाग लेते है।
=> यह प्रत्येक मनुष्य में एक जोड़ी होता है जो देहभित्ति से सटे हुए कशेरुकदंड के दोनों ओर स्थित होता है।इसका आकार सेम के बीज जैसा होता है।
=> वृक्क का भीतरी सतह हाइलम कहलाता है जिससे वृक्क धमनी तथा वृक्क शिरा जुड़ा होता है।इससे एक और नली जुडी होती है, जिसे मूत्रवाहिनी कहते है। ये मूत्रवाहिनी पीछे की ओर मूत्राशय में खुलती है।
=> मूत्राशय एक थैलीनुमा रचना है जो रेक्टम के नीचे स्थित
होता है तथा इसके पीछे से एक नली जुडी होती है जिसे,मूत्रमार्ग कहते है।
नेफ्रॉन या वृक्क-नलिकाएँ (nephron)
प्रत्येक वृक्क में सूक्ष्म लम्बी कुंडलित नलिकाएँ पाई जाती है, जिसे नेफ्रॉन या वृक्क नलिकाएँ कहते है। नेफ्रॉन वृक्क की रचनात्मक एवमं क्रियात्मक इकाई है।
प्रत्येक वृक्क में लगभग 10,00,000 नेफ्रॉन होते हैं।इसकी प्याले जैसी रचना बोमैन-सम्पुट कहलाती है।इसमें दो कुंडलित समीपस्थ तथा दूरस्थ भाग होते है।
समीपस्थ भाग के नीचे अवरोधी चाप तथा दूरस्थ भाग में अधिरोधी चाप बनता है तथा इन चापों के बीच का भाग हेनले का चाप कहलाता है।जो संग्राहक नलिका में खुलता है।
" वृक्क के कार्य "
=> वृक्क द्वारा उत्सर्जन निम्न तीन चरणों द्वारा होता है-
1 ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन (glomerular filtration) => यह छन्नी की तरह कार्य करता है।साथ ही रक्त के यूरिया,यूरिक एसिड, जल ग्लूकोस ,प्रोटीन छनकर वृक्क नलिकाओं में भेज देता है।
2 ट्यूबलर पुनवशोषण (tubular reabsorption)=>
इसके अंतर्गत नलिकाओं से गुजर रहे ग्लूकोस का दोबारा अवशोषण होता है, जिसे पुनवशोषण कहते है।
3 ट्यूबलर स्त्रवण ( tubular secretion)=>
नलिकाओं की कोशिकाओं से कुछ उत्सर्जी पदार्थ बहकर फिल्ट्रेट से मिल जाते है, जिसे ब्लाडर मूत्र कहते है जो नलिका से होकर गुजरता है तथा मूत्राशय में जमा हो जाता है।
जिसको समय-समय पर मूत्रमार्ग के छिद्र द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।
हिमोडायलिसिस (Haemodialysis)
=> जब किसी मनुष्य का वृक्क किसी कारण वश क्षतिग्रस्त हो जाता है या काम करना बंद कर देता है तो ऐसी स्थिति में हीमोडायलिसिस का प्रयोग किया जाता है।
इस प्रक्रिया में एक विशेष प्रकार के डायलिसिस मशीन का उपयोग किया जाता है, जिसे कृत्रिम- वृक्क भी कहा जाता है।
=> इस मशीन में एक टँकी लगी होती है जिसे, डायलाइजर कहते है। इसके अंदर एक तरल पदार्थ होता है जिसे डायलिसिस फ्लुइड कहते है।
=> धमनी द्वारा अशुद्ध रक्त को निकालकर हीमोडायलिसिस प्रक्रिया द्वारा शुद्ध कर पुनः शिराओं द्वारा शरीर में भेंज दिया जाता है।
=> जीवो में उपापचयी क्रियाओ के फलस्वरूप उतपन्न अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन उत्सर्जन कहलाता है।
उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप शरीर में कुछ ऐसे पदार्थों का निर्माण होता है जो शरीर के लिए हानिकारक एवमं अनावश्यक होते है, इन्हे उत्सर्जी पदार्थ कहते हैं तथा जिस क्रिया द्वारा इन पदार्थों को शरीर से बाहर निकाला जाता है उसे उत्सर्जन कहते है।
कुछ उत्सर्जी पदार्थ जैसे:- अमोनिया ,यूरिया,यूरिक एसीड आदि।
पौधों में उत्सर्जन
=> पौधों में उत्सर्जन के लिए कोई विशेष अंग नही होता है।ये विभिन्न तरीकों द्वारा उत्सर्जन करते हैं।
जैसे :- रंध्रों या वात रंध्रों द्वारा ऑक्सीजन का उत्सर्जन जल आदि।
इनके कुछ उत्सर्जी पदार्थ जैसे :- टैनिन,रेजिन,गोंद ,लैटेक्स आदि है।
=> टैनिन वृक्ष की छालों में जबकि रेजिन एवम गोंद पुराने जाइलम में संचित रहता है।
=> कुछ पौधों में गाढ़ा दूधिया तरल उत्सर्जी पदार्थ संचित होते है जिसे लैटेक्स कहते है।
=> गोंद बबूल के पौधों का उत्सर्जी पदार्थ है जबकि रेजिन चीड़ के पौधे का।
=> निम्न वर्ग के जीवों में विशेष प्रकार का उत्सर्जन अंग नहीं होता है। इनमें उत्सर्जन शरीर के सतह द्वारा विसरण प्रक्रिया से होता है।
जबकि जटिल बहुकोशिकीय जीवों में विशेष प्रकार का अंग होता है जिसे "उत्सर्जी अंग" कहते है।
" मनुष्य में उत्सर्जन "
=> वृक्क मनुष्य एवं सभी वर्टिब्रेटा उपसंघ के जीवों का सबसे महत्वपूर्ण उत्सर्जी अंग है। इसके साथ-साथ मूत्रवाहिनी (ureter),मूत्राशय (urinary bladder) तथा मूत्रमार्ग (urethra) भी उत्सर्जन में भाग लेते है।
=> यह प्रत्येक मनुष्य में एक जोड़ी होता है जो देहभित्ति से सटे हुए कशेरुकदंड के दोनों ओर स्थित होता है।इसका आकार सेम के बीज जैसा होता है।
=> वृक्क का भीतरी सतह हाइलम कहलाता है जिससे वृक्क धमनी तथा वृक्क शिरा जुड़ा होता है।इससे एक और नली जुडी होती है, जिसे मूत्रवाहिनी कहते है। ये मूत्रवाहिनी पीछे की ओर मूत्राशय में खुलती है।
=> मूत्राशय एक थैलीनुमा रचना है जो रेक्टम के नीचे स्थित
होता है तथा इसके पीछे से एक नली जुडी होती है जिसे,मूत्रमार्ग कहते है।
नेफ्रॉन या वृक्क-नलिकाएँ (nephron)
प्रत्येक वृक्क में सूक्ष्म लम्बी कुंडलित नलिकाएँ पाई जाती है, जिसे नेफ्रॉन या वृक्क नलिकाएँ कहते है। नेफ्रॉन वृक्क की रचनात्मक एवमं क्रियात्मक इकाई है।
प्रत्येक वृक्क में लगभग 10,00,000 नेफ्रॉन होते हैं।इसकी प्याले जैसी रचना बोमैन-सम्पुट कहलाती है।इसमें दो कुंडलित समीपस्थ तथा दूरस्थ भाग होते है।
समीपस्थ भाग के नीचे अवरोधी चाप तथा दूरस्थ भाग में अधिरोधी चाप बनता है तथा इन चापों के बीच का भाग हेनले का चाप कहलाता है।जो संग्राहक नलिका में खुलता है।
" वृक्क के कार्य "
=> वृक्क द्वारा उत्सर्जन निम्न तीन चरणों द्वारा होता है-
1 ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन (glomerular filtration) => यह छन्नी की तरह कार्य करता है।साथ ही रक्त के यूरिया,यूरिक एसिड, जल ग्लूकोस ,प्रोटीन छनकर वृक्क नलिकाओं में भेज देता है।
2 ट्यूबलर पुनवशोषण (tubular reabsorption)=>
इसके अंतर्गत नलिकाओं से गुजर रहे ग्लूकोस का दोबारा अवशोषण होता है, जिसे पुनवशोषण कहते है।
3 ट्यूबलर स्त्रवण ( tubular secretion)=>
नलिकाओं की कोशिकाओं से कुछ उत्सर्जी पदार्थ बहकर फिल्ट्रेट से मिल जाते है, जिसे ब्लाडर मूत्र कहते है जो नलिका से होकर गुजरता है तथा मूत्राशय में जमा हो जाता है।
जिसको समय-समय पर मूत्रमार्ग के छिद्र द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।
हिमोडायलिसिस (Haemodialysis)
=> जब किसी मनुष्य का वृक्क किसी कारण वश क्षतिग्रस्त हो जाता है या काम करना बंद कर देता है तो ऐसी स्थिति में हीमोडायलिसिस का प्रयोग किया जाता है।
इस प्रक्रिया में एक विशेष प्रकार के डायलिसिस मशीन का उपयोग किया जाता है, जिसे कृत्रिम- वृक्क भी कहा जाता है।
=> इस मशीन में एक टँकी लगी होती है जिसे, डायलाइजर कहते है। इसके अंदर एक तरल पदार्थ होता है जिसे डायलिसिस फ्लुइड कहते है।
=> धमनी द्वारा अशुद्ध रक्त को निकालकर हीमोडायलिसिस प्रक्रिया द्वारा शुद्ध कर पुनः शिराओं द्वारा शरीर में भेंज दिया जाता है।
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