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Wednesday, 5 December 2018

जैव प्रक्रम : पोषण (life process)

   


* जैव प्रक्रम (life process):-  वे सभी क्रियाए जिसके द्वारा जीवो का अनुरक्षण (maintenance)  होता है ,उसे जैव प्रक्रम कहते हैं।
     जैसे:- श्वसन,उत्सर्जन,पोषण,जनन,आदि।

               पोषण (NUTRITION)

=> वह क्रिया जिसमे जीव पोषक तत्वो को ग्रहण कर उनका उपयोग करते हैं ,उसे पोषण कहते हैं।यह दो प्रकार का होता है-
1 स्वपोषण (autotrophic nutrition)

2 परपोषण (heterotrophic nutrition)



* स्वपोषण :- इस शब्द की उतपत्ति दो ग्रीक शब्दो ऑटो और ट्राफ से हुई है ।ऑटो मतलब स्वतः तथा ट्रॉप मतलब पोषण होता है।
           इस क्रिया के अंतर्गत जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं तथा ऐसे जीव स्वपोषी कहलाते हैं।
    जैसे:- सभी हरे पेड़-पौधे ।


* परपोषण:- पर पोषण शब्द की उतपत्ति भी दो ग्रीक शब्दो हेट्रो और ट्रॉप से हुई है जिसका अर्थ क्रमशः भिन्न या पर तथा पोषण होता है।
        इस  क्रिया में जीव अपना भोजन स्वमं न बना कर किसी दूसरे जीव पर निर्भर हो कर करते हैं। तथा ऐसे जीव परपोषी कहलाते हैं।
    जैसे:- मनुष्य,जानवर,पक्षी, सूक्ष्मजीव आदि।

 यह तीन प्रकार का होता है -
1 मृतजीवी पोषण ( saprophytic nutrition)
2 प्राणीसम पोषण ( holozoic nutrition)
3 परजीवी पोषण (parasitic nutrition)

 *मृतजीवी पोषण :-  इस क्रिया के अंतर्गत जीव मृत जन्तुओ या पेड़-पौधों से अपना भोजन प्राप्त करते है और ऐसे जीव मृतजीवी कहलाते हैं । जैसे:- कवक ,बैक्टीरिया,प्रोटोजोआ आदि।

* मृतजीवी को अपघटक भी कहा जाता है।


* प्राणीसम पोषण :- वह क्रिया जिसमे जीव अपना भोजन ठोस या तरल रूप  में ग्रहण करते हैं उसे प्राणिसम पोषण कहते हैं तथा ऐसे जीव  प्राणीसमभोजी   कहलाते हैं।
 जैसे :- अमीबा,मनुष्य,मेढक आदि।


* परजीवी पोषण :- वह प्रक्रिया जिसमे एक जीव किसी दूसरे जीव के सम्पर्क में रह कर अपना भोजन करते हैं ,उसे परजीवी पोषण कहते हैं तथा ऐसे जीव परजीवी कहलाते हैं।
    जैसे :- कवक , जीवाणु ,गोलकृमि ,अमरबेल ,मलेरिया आदि ।




                    जन्तुओ में पोषण

=> जंतु परपोषी होते हैं क्योंकि ये अपने भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं।ये मृतजीवी,परजीवी,या प्राणिसम पोषी भी हो सकते हैं।

=>  अमीबा एक सरल प्रणीसमपोषी जीव है ये अपने कुटपदो द्वारा भोजन ग्रहण करता है। इसमें पोषण अंतर्ग्रहण ,पाचन, तथा बहिष्करण क्रिया से पूरा होता है।


=> मनुष्य तथा उच्च श्रेणी के जन्तुओ में भोजन के पाचन के लिए विशेष अंग होते हैं जिसे आहारनाल कहते है ।

=> आहारनाल ,पाचक ग्रन्थियां और पाचन क्रिया मिलकर पाचनतंत्र (digestive system) का निर्माण करते हैं।



      मनुष्य का आहारनाल





=> मनुष्य का आहारनाल 8 से 10 मीटर लंबा, कुंडलित होता है जो मुखगुहा से लेकर मलद्वार तक फैला होता है ।


 *              मुखगुहा

=> यह आहारनाल का पहला भाग होता है जो ऊपर तथा नीचे जबड़ो (jaws) से घिरा होता है इसे खोलने और बन्द करने के लिए दो मांसल होठ होते हैं  तथा इसके अंदर एक जीभ और दाँत होते हैं।


 * जीभ  :-  यह एक माँसल रचना है जो आगे से स्वतंत्र तथा पीछे से मुखगुहा के फर्श से जुड़ा रहता है। इस पर कई छोटे-छोटे अंकुर (papillae)  होते है जिसे स्वाद कलियाँ कहते हैं इन स्वाद कलियों द्वारा ही हम भोजन के विभिन्न स्वादों मीठा,खट्टा,कडुआ, खारा आदि का अनुभव करते हैं  और इसकी गति भोजन निगलने में मदद करती है।


* दाँत :- मुखगुहा के ऊपरी तथा निचले जबड़ो में दाँत होते हैं जो जबड़ो के मसूढे से जुड़ा होता है । दाँत का वह भाग जो मसुढा में धँसा होता है ,उसे जड़ तथा ऊपर का भाग सिर या शिखर कहलाता है एवम बीच का भाग ग्रीवा या गर्दन कहलाता है।
             दाँत भोजन को काटने या चबाने का कार्य करता है।वयस्को में इसकी संख्या 32 होती है। यह चार प्रकार का होता है -
1 कर्तनक (incisor )
2 भेदक ( (canines)
3 अग्रचवर्णक (premolar)
3 चवर्णक (moler)

 => मनुष्य के मुखगुहा में तीन जोड़ी लारग्रँथि पाई जाती है-

1 पैराटिड ग्रन्थि (parotid gland )
2 सबमैंडिबुलर लारग्रँथि (submandibular gland )
3 सबलिंगुअल लारग्रँथि (sublingual gland )


ग्रसनी (pharynx):-  मुखगुहा का पिछला भाग ग्रसनी कहलाता है। जिसमे दो छिद्र होते हैं-

1 निगलद्वार (gullet)
2 कंठद्वार ( glottis)

 कंठद्वार के आगे एक पट्टी है जिसे एपिग्लौटिस(epiglottis) कहते है जो भोजन को श्वासनली में जाने से रोकता है।


* ग्रासनली (oesophagus) :- लार से सना भोजन निगलद्वार के बाद ग्रासनली में प्रवेश करता है जिसमे क्रमाकुंचन होता है और भोजन आमाशय में पहुचता है।


* आमाशय (stomach) :-  यह थैली जैसी रचना है जिसके आगे का भाग कार्डिएक पिछला भाग पाइलोरिक तथा बीच का भाग फूडिक कहलाता है। इसका धँसा भाग आमाशय ग्रन्थि या जठर ग्रंथि का निर्माण करता है । जठर ग्रंथि की कोशिकाए तीन प्रकार की होती है-


1 श्लेष्मा या म्यूकस कोशिकाए (mucous cells )
2 भित्तीय या अम्लजन कोशिकाए (parietal or oxyntic cells)
3 मुख्य या जाइमोजिन कोशिकाए (chief or zymogen cells)


नोट :- ये तीनो कोशिकाये जठर रस का निर्माण करती है।


=> अम्लजन कोशिका से HCl  अम्ल का स्त्राव होता है जो भोजन में आए जीवाणुओं को नष्ट कर देता है तथा निष्क्रिय पेप्सिनोजेन को सक्रिय पेप्सिन नामक एंजाइम में बदल देता है।
   जठर रस में HCl अम्ल , श्लेष्मा तथा निष्क्रिय पेप्सिनोजेन होता है। जब hcl की मात्रा बढ़ जाती है तो आमाशय के भीतरी सतह पर सुरक्षा के रूप में लगे श्लेष्मा कोशिका को कमजोर कर देता है जिसे पेप्टिक अल्सर कहते हैं।

* आमाशय में प्रोटीन तथा वसा का पाचन होता है तथा इनके बाद जो अवशेष बचता है उसे क़ाइम कहते हैं।


* अग्न्याशय (pancreas ) :- आमाशय के ठीक नीचे पीले रंग की एक ग्रन्थि होती है जिसे अग्न्याशय कहते हैं।इसके रस में ट्रिप्सिन, एमाइलेस , लाइपेस ,न्यूक्लियेस नामक एंजाइम पाए जाते हैं।


* यकृत (liver) :- यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है जिसका भार लगभग 1.5 kg का होता है।इससे पित्त का स्त्राव होता है।
   पित्त एक हरे रंग का क्षारीय गाढ़ा चिपचिपा द्रव है जिसमें कोई एंजाइम नही होता है।यह एक थैली में संचित होता है जिसे पित्ताशय कहते हैं। पित्त अम्लीयता तथा वसा का विखण्डन करता है ।


* छोटी आँत (small intestine ) :- यह आहारनाल का सबसे बड़ा भाग होता जो 6cm लंबा तथा 2.5cm चौड़ा होता है।विभिन्न जीवो में इसकी लम्बाई भी भिन्न भिन्न होती है। मांसाहारी जन्तुओ में यह कम लम्बाई का तथा शाकाहारी जन्तुओ में अधिक लम्बाई का होता है। यह तीन भागों में बांटा होता है -

1 गृहणी (duodenum )
2 जेजुनम (jejunum)
3 इलियम (ileum)


* छोटी आंत का पहला भाग गृहणी होता है जो c आकार का होता है तथा इसमें दो छिद्र होते हैं-
1 अग्न्याशयी वाहिनी (pancreatic duct)
2 मूल पित्तवाहिनी ( common bile duct )

* जेजुन :- छोटी आंत का मध्य भाग जेजुनम होता है।

*  इलियम  :- छोटी आंत का अधिकांश भाग इलियम ही होता है। इसमें ही भोजन का पाचन समाप्त होता है।



* आंत ग्रन्थियां (intestinal gland ):-  छोटी आंत में उपस्थित ग्रँथियो को आंत ग्रन्थि कहते हैं। तथा छोटी आंत में बचे भोजन के अपशिष्ट को चाइल कहते हैं।इसका अवशोषण इलियम में होता है।


* बड़ी आंत ( large intestine) :-  छोटी आंत के बाद अगला भाग बड़ी आंत का होता है यह दो भागों कोलन(colon) तथा मलाशय या रेक्टम (rectum) में बटा हुआ है। छोटी आंत और बड़ी आंत के जोड़ को सिकम (caecum)  कहते हैं। सिकम के सिर पर अँगुली जैसी रचना होती है जिसका सिरा बंद होता है उसे एपेंडिक्स कहते हैं।

एपेंडिक्स का कोई कार्य नही है।















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