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Friday, 14 June 2019

जनन ( reproduction )

                         पाठ - 6  

          जनन ( Reproduction )


 * जनन : - वह प्रक्रिया जिसके अंतर्गत कोई जीव अपनी वृद्धि करता है, उसे जनन या प्रजनन कहते है 
               दूसरे धब्दो में कहे  तो  हर जीव  अपने जैसी  सामान सन्तति को उत्पन्न करने की क्षमता रखता है जीवो की इस क्षमता को जनन या प्रजनन कहते  है

*  यह दो प्रकार का होता है - 

1) अलैंगिक जनन ( asexual reproduction )

2) लैंगिक जनन ( sexual reproduction )

     अलैंगिक जनन ( asexual reproduction)


* अलैंगिक जनन (asexual reproduction) : - 
जनन की वह प्रक्रिया जिसमे  शुक्राणु  और अंडाणु भाग नही लेते है उसे अलैंगिक जनन कहते है
           इसमें निषेचन की क्रिया नही होती है  यह समसूत्री कोशिका विभाजन या असमसूत्री कोशिका विभाजन से संपन्न होता है। अलैंगिक जनन की कई विधियाँ होती है---

जैसे :- मुकुलन,विखण्डन, अपखण्डन या पुनर्जनन, बिजानुजनन ,कायिक प्रवर्धन,ऊतक संवर्धन आदि ।


* मुकुलन (Budding) :-  अलैंगिक जनन की वह विधि है जो जनक के शरीर  से प्रवर्ध निकलने के बाद ही संपन्न होता है।
       इसमें जनक के शरीर से प्रवर्ध निकलते है, जिसे मुकुल या बड (bud) कहते है। यह एक कोशिकीय तथा बहुकोशिकीय जीवो में होता है।
            जैसे :- यीस्ट आदि

* पुनर्जनन या अपखण्डन :- अलैंगिक जनन की वह प्रक्रिया जिसमे जनक का शरीर किसी कारण दो या दो से अधिक टुकड़ो में बंट जाता है तथा प्रत्येक टुकड़ा अपने खोये हुए भाग को विकशित कर एक नये जीव में परिवर्तित हो जाता है , उसे पुनर्जनन या अपखण्डन कहते हैं।
           जैसे :- हाइड्रा, प्लेनेरिया आदि।

* कायिक प्रवर्धन  :- अलैंगिक जनन की वह विधि जिसके अंतर्गत पादप के शरीर का कोई भाग (जैसे :- पत्तिया,तना, जड़ ) अलग कर एक नए पौधों का निर्माण किया जाता है।
      जैसे :- अंगूर,गुलाब,ईख आदि ।

* उत्तक सम्वर्धन :- जनन की वह विधि जिसके अंतर्गत एक स्वस्थ पौधों से उत्तक का एक छोटा टुकड़ा काट लिया जाता है तथा उसे एक पात्र में पोषक पदार्थ के घोल में रख दिया जाता है।
        यह अनुकूल परिस्थिति में एक पिंड बन जाता है जिसे कैलस ( callus )  कहा जाता है।
   जैसे :- गुलदाऊदी आदि ।

* बीजाणुजनन :- यह जनन की वह विधि है जिसके अंतर्गत सूक्ष्म थैली जैसी बीजाणुधमनियों का निर्माण होता है तथा इसके भीतर अनेक छोटी-छोटी रचनाये बनती है, जिसे बीजाणु कहा जाता है ।



* विखण्डन ( Fission ) :- इस विधि से एक कोशिकीय जीव जनन करते हैं।
  जैसे :- अमीबा,युगलीन, शैवाल,पैरामिशियम आदि ।

* यह दो प्रकार का होता है -----

a) द्विविखण्डन ( Binary fission)

b) बहुखण्डन ( Multiple fission ) 

* द्विखण्डन (Binary fission ) :-  वैसा विभाजन जिसके द्वारा एक जीव खण्डित हो कर दो जीवों का निर्माण करता है, उसे द्विविखण्डन कहते हैं।
 जैसे :- पैरामिशियम,अमीबा आदि ।

* बहुखण्डन (Multiple fission ) :- वैसा विभाजन जिसके द्वारा एक जीव खण्डित हो कर अनेक जीवों का निर्माण करता है, उसे बहुुखण्डन कहते हैं।
 जैसे :- अमीबा आदि ।



  लैंगिक जनन ( sexual reproduction )


   जनन की वह विधि जिसमे नर और मादा दोनो भाग लेते हैं ,उसे  लैंगिक जनन कहते हैं ।

* नर ( male) :- नर उसे कहा जाता है, जो शुक्राणु उतपन्न करते हैं।

* मादा (Female) :-  वह जीव जो अंडाणु उतपन्न करता है, उसे मादा कहते हैं।


* एकलिंगी ( unisexual ) :- वैसे जीव जिनमे नर और मादा लिंग अलग-अलग जीव में पाए जाते हैं ,उन्हें एकलिंगी कहा जाता है।


* द्विलिंगी (bisexual ) :- वैसे जीव जिनमे नर और मादा लिंग दोनो एक ही जीव में पाए जाते हैं ,उसे द्विवलिंगी या उभयलिंगी कहते हैं।


                        नर जनन अंग 





=> नर जनन अंग में कई भाग होते हैं जैसे वृषण(testes), अधिवृषण (epididymis),  मूत्रमार्ग (deferens), शुक्राशय ( seminal vesicle) , शिशन(penis) आदि।

* वृषण (testes) :-  यह जनन का प्रमुख और महत्वपूर्ण जनन अंग होता है क्योंकि शुक्राणु निर्माण इसी में होता है ।
      प्रत्येक मनुष्य में यह एक जोड़ी होता है जो अंडाकार होता है । यह पेशियों से बनी एक थैली में स्थित होता है, जिसे वृषनकोष कहते हैं।

* अधिवृषण ( epididymis) :-  यह एक घुमावदार लम्बी नली होती है जो भीतर की ओर वृषण के किनारों से चिपका होता है, जिसे अधिवृषण कहते हैं।


* शुक्रवाहिनी (vas deferens ) :-   अधिवृषण से के नलिकाएँ निकली होती है जिन्हें शुक्रवाहिका कहा जाता है।
    इसमे ही शुक्राणु संग्रहित होता है तथा निषेचन के लिए परिपक्व तथा सक्रिय होता है। 

* शुक्रजनन नलिकाएँ :- प्रत्येक वृषण में कई कुंडलित नलिकाएँ पाई जाती है जिन्हें,शुक्रजनन नलिकाएँ कहते हैं।


* वीर्य (semen ):-  पुरः स्थ द्रव ,शुक्राणु द्रव तथा शुक्राय मिलकर वीर्य का निर्माण करते हैं। 
          पुरः स्थ द्रव के कारण ही वीर्य में विशेष गन्ध होती है।

काउपर ग्रन्थि (Cowper's gland) :-  पुरः स्थ ग्रन्थि के ठीक नीचे काउपर  ग्रन्थि होती है । यह मादा की योनि की अम्लीयता को नष्ट करता है तथा शुक्राणु को सुरक्षित रखने का कार्य करता है। 


                 मादा जनन अंग 



=> जिस प्रकार नर जनन अंग के कई भाग होते है उस प्रकार मादा जनन अंग के  भी कई प्रकार होते हैं  जैसे      अंडाशय (ovary), गर्भाशय (uterus) ,योनि (vagina) ,भग (vulva) आदि ।



* अण्डाशय ( ovary ) :-  यह एक जोड़ी होता है जो मादा में पाया जाता है । ये अण्डाशय संयोजी उत्तक के एक आवरण से ढका होता है, जिसे एल्बुजीनिया कहा जाता है।
  एपिथिलीयम में ही अंडाणु का विकास होता है।

* फिलॉपीयन नालिका :- यह भी एक जोड़ी होता है जो अण्डाशय के ऊपर भाग से शुरू हो कर नीचे की ओर गर्भाशय से जुड़ा होता है । 
      इसकी दीवारे संकुचनशील होती है इस नली के माध्यम से अंडाणु गर्भाशय में प्रवेश करती है।


* गर्भाशय  :-  मूत्राशय और मलाशय के बीच गर्भाशय  स्थित होता है । यह थैलीनुमा होता है । इसका आकार तिकोना होता है जिसमे ऊपर का भाग चौड़ा तथा निचला भाग कोणीय होता है। इसके दाये और बाये कोनो से फैलोपियन नलिका जुड़ी होती है ।
      इसके गुहा में भूर्ण का विकास होता है और सामान्य स्थिति में यह 7 से 8 cm लम्बी होती है  लेकिन जब भ्रूण का विकास होता है तो लगभग 8वे महीने में यह 18 से 20 cm की  लम्बा हो जाता है।

* गर्भाशय का शंक्वाकार भाग ग्रीवा कहलाता है।




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